Corporate Office: G-66, Ground Floor, Sector 63, NOIDA 201307 

Mobile: 98215 82424

© 2018 by SATAT SAMPADA 

Site by PLRC Digital 9582762505

March 2018

ASSOCHAM & EY (2016) - The organic market is seeing CAGR of 25% and will touch 12,000 Cr by 2020.

“हम काफी पहले से शहरी गरीबों के साथ काम कर रहे हैं. हमने ये देखा कि बहुत सारे लोग शहरों में आ तो गये हैं लेकिन वापस गांव जाना चाहते हैं. ये लोग किसान परिवारों से हैं. हमने इन इलाकों में जाकर किसानों को जैविक खेती करने को प्रोत्साहित किया और उनके उत्पाद उस इलाके के रिटेल भाव में खरीदने शुरू किये. हमने किसानों से कहा कि आप मेहनत करते हो तो आम दाम तय करो. इससे किसानों में उत्साह पैदा हुआ.”

इस तरह से खरीदे गये जैविक फल और सब्ज़ियों की कीमत बाज़ार आते आते सामान्य उत्पादों के मुकाबले 30 से 40 प्रतिशत अधिक होती है. यही ज्योति जैसे उद्यमियों के लिये चुनौती है. “शुरुआत में हमने घाटा खाकर ये काम शुरू किया लेकिन हमें उम्मीद है कि किसानों और ग्राहकों में जागरूकता बढ़ेगी तो ये सबके लिये विन-विन वाली सिचुएशन होगी.” सतत की निदेशक ज्योति अवस्थी कहती हैं. ऐसे उद्यमियों की अब एक कड़ी बन रही है. मिसाल के तौर पर 38 साल के गणेश चौधरी को लीजिये जिनका जैविक उत्पादों का कारोबार मध्य प्रदेश के कटनी से लेकर दक्षिण में हैदराबाद तक फैल रहा है.

January 2018

March 2018

SATAT in Media

March 2018

ASSOCHAM & EY (2016) - The organic market is seeing CAGR of 25% and will touch 12,000 Cr by 2020.

If these farmers are successful today, it is also because of budding social entrepreneurs such as Jyoti Awasthi, who started a chain of outlets called Satat Organics to sell organically grown food and other products. She buys such organically grown products from these farmers at their local retail rates and transports the goods through economically effective means like trains, thus setting up a low budget yet efficient system to provide safe food to urban populace in Ghaziabad and Noida in the National Capital Region.

Screenshot_20190512-184429__01.jpg

March 2018

Screenshot_20190512-183738__01.jpg

“हम काफी पहले से शहरी गरीबों के साथ काम कर रहे हैं. हमने ये देखा कि बहुत सारे लोग शहरों में आ तो गये हैं लेकिन वापस गांव जाना चाहते हैं. ये लोग किसान परिवारों से हैं. हमने इन इलाकों में जाकर किसानों को जैविक खेती करने को प्रोत्साहित किया और उनके उत्पाद उस इलाके के रिटेल भाव में खरीदने शुरू किये. हमने किसानों से कहा कि आप मेहनत करते हो तो आम दाम तय करो. इससे किसानों में उत्साह पैदा हुआ.”

इस तरह से खरीदे गये जैविक फल और सब्ज़ियों की कीमत बाज़ार आते आते सामान्य उत्पादों के मुकाबले 30 से 40 प्रतिशत अधिक होती है. यही ज्योति जैसे उद्यमियों के लिये चुनौती है. “शुरुआत में हमने घाटा खाकर ये काम शुरू किया लेकिन हमें उम्मीद है कि किसानों और ग्राहकों में जागरूकता बढ़ेगी तो ये सबके लिये विन-विन वाली सिचुएशन होगी.” सतत की निदेशक ज्योति अवस्थी कहती हैं. ऐसे उद्यमियों की अब एक कड़ी बन रही है. मिसाल के तौर पर 38 साल के गणेश चौधरी को लीजिये जिनका जैविक उत्पादों का कारोबार मध्य प्रदेश के कटनी से लेकर दक्षिण में हैदराबाद तक फैल रहा है.

किसानों को कर्ज़ के चक्रव्यूह से बाहर निकालना और मुनाफे की खेती कराना इतना आसान नहीं था और गरीबी की जंग से लड़ने में कुछ उद्यमियों ने साथ दिया है जो इस बदलाव को व्यापक बना रहे हैं जहां खेतों में उगी उनकी फसल और ग्राहक के बीच की कड़ियां जुड़ती हैं. दिल्ली से सटे गाज़ियाबाद और मालचा मार्ग में जैविक उत्पादों का बाज़ार लगाने वाली ज्योति अवस्थी ने पिछले करीब 2 सालों में एक लम्बी दूरी तय कर चुकी हैं. सतत आर्गेनिक नाम से उनकी पहल रंग ला रही है. वह आज पश्चिमी उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और बुंदेलखंड के दर्जनों किसान परिवारों के साथ जुड़ चुकी है. अवस्थी कहती हैं कि वह किसानों को उत्साहित करने की ज़रूरत थी और इसके लिये पहली चीज़ उन्हें उस फसल के सही दाम चाहिये जो वह उगा रहे हैं.

Screenshot_20190512-184922__01.jpg

January 2018

March 2018

news18-main.png

April 2019

“Our politicians can and should learn a lot from these farmers and entrepreneurs. Even smallholder farmers are now understanding the hazards of conventional chemical-based farming and are turning to safe and sustainable way of agriculture,” says Jyoti Awasthi who has provided a platform to more than 100 farmers to sell their products in Delhi NCR under the brand name – Eat Right Basket. “We strive to be fair to both farmers and consumers. We continuously educate our buyers about the hardships farmers face to produce safe food and therefore they should be paid fairly,” adds Awasthi.